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सुप्रीम कोर्ट 24 घंटे का नियम: हिरासत के पल से गिनी जाएगी मियाद, ‘फॉर्मल अरेस्ट’ का बहाना खत्म; देर हुई तो तुरंत रिहाई

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सुप्रीम कोर्ट 24 घंटे का नियम: हिरासत के पल से गिनी जाएगी मियाद, ‘फॉर्मल अरेस्ट’ का बहाना खत्म; देर हुई तो तुरंत रिहाई
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📌 खबर के मुख्य बिंदु (Key Highlights):
  • ताजा अपडेट: सुप्रीम कोर्ट 24 घंटे का नियम: हिरासत के पल से गिनी जाएगी मियाद, ‘फॉर्मल अरेस्ट’...
  • स्थानीय प्रभाव: घटनाक्रम पर प्रशासन और पुलिस बल की पैनी नजर, स्थिति सामान्य।
  • विस्तृत रिपोर्ट: संपूर्ण विवरण, घटनाक्रम और संबंधित बयानों को नीचे पढ़ें।

नई दिल्ली। पुलिस और जांच एजेंसियों की मनमानी पर लगाम लगाने वाला एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (5 नवंबर 2026) को साफ कर दिया कि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की सुप्रीम कोर्ट 24 घंटे की संवैधानिक मियाद उसी पल से शुरू होगी जब उसे हिरासत में लिया गया और उसकी आज़ादी पर रोक लगी, न कि तब से जब पुलिस कागज़ों में ‘औपचारिक गिरफ्तारी’ दर्ज करती है।

सुप्रीम कोर्ट 24 घंटे फैसला: किस बेंच ने सुनाया

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने यह फैसला सुजीत दास बनाम भारत संघ मामले में दिया। मामला त्रिपुरा हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ चार लोगों की अपीलों से जुड़ा था, जिसमें NDPS एक्ट के केस में उन्हें ज़मानत देने से इनकार किया गया था। पीठ ने कहा कि ‘गिरफ्तारी’ और ‘हिरासत’ के बीच कृत्रिम भेद खींचना संविधान के अनुच्छेद 22(2) से मिली मौलिक सुरक्षा को कमज़ोर या खत्म करने जैसा है।

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जस्टिस भुइयां ने कहा कि संविधान गिरफ्तारी से अलग किसी हिरासत को मान्यता नहीं देता। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने यहां तक कहा कि हिरासत में लेने के इरादे से अगर किसी को छुआ भी गया, तो वह गिरफ्तारी मानी जाएगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि 24 घंटे केवल औपचारिक गिरफ्तारी से गिनने का नज़रिया अनुच्छेद 22(2) और BNSS की धारा 56 के संवैधानिक आदेश के विपरीत है।

फैसले के 7 बड़े बिंदु

  • 24 घंटे की मियाद हिरासत की तारीख और समय से शुरू होगी, जब व्यक्ति की आज़ादी छिनी।
  • अगर पेशी से पहले हिरासत 24 घंटे पार कर जाए, तो व्यक्ति को तुरंत रिहा किया जाएगा।
  • गिरफ्तारी स्थल से मजिस्ट्रेट की अदालत तक की यात्रा के समय के अलावा कोई और समय नहीं घटाया जाएगा।
  • ओडिशा, मद्रास और केरल हाईकोर्ट के उलट फैसले (आर्यमा पटनायक, कन्नन, अरुण के. थॉमस) सही कानून नहीं हैं।
  • एजेंसियां ध्यान रखें कि 24 घंटे के भीतर भी हिरासत ‘उचित अवधि’ से ज़्यादा न हो (BNSS धारा 58)।
  • पेशी के समय मजिस्ट्रेट हिरासत की असली तारीख-समय दर्ज करेंगे और 24 घंटे का पालन जांचेंगे।
  • 24 घंटे के भीतर भी अगर हिरासत अनुचित रूप से लंबी हो, तो मजिस्ट्रेट रिमांड देने से इनकार कर सकते हैं।

अब तक कैसे चलता था खेल

अब तक कई मामलों में पुलिस और एजेंसियां व्यक्ति को घंटों या दिनों तक ‘पूछताछ’ या ‘तलाशी-ज़ब्ती’ के नाम पर बैठाए रखती थीं और फिर कागज़ पर गिरफ्तारी दिखाकर वहीं से 24 घंटे गिनती थीं। पहले की हिरासत का हिसाब ही नहीं होता था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तलाशी-ज़ब्ती पूरी होने के बाद औपचारिक गिरफ्तारी से समय गिनना न सिर्फ कानूनन टिकाऊ नहीं, बल्कि पूरी तरह असंवैधानिक है।

क्यों अहम है यह फैसला

कानूनी जानकारों के मुताबिक यह फैसला हिरासत में यातना और गैरकानूनी कैद पर सीधा प्रहार है। NDPS, PMLA जैसे सख्त कानूनों में अक्सर पूछताछ के लंबे दौर चलते हैं; अब मजिस्ट्रेट को खुद देखना होगा कि आज़ादी असल में कब छिनी। आम नागरिक के लिए संदेश साफ है – पुलिस थाने में ‘बस पूछताछ’ के नाम पर रोके जाने का समय भी अब संवैधानिक घड़ी में गिना जाएगा।

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आगे का असर

फैसले के बाद देशभर की निचली अदालतों में रिमांड की सुनवाई का तरीका बदलेगा। पुलिस को हिरासत का सटीक समय दर्ज करना होगा, वरना आरोपी सीधे रिहाई का हकदार होगा। यह फैसला आने वाले वर्षों में आपराधिक न्याय प्रणाली की नज़ीर बनेगा।

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