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इस्लामी धर्मांतरण रैकेट —: मां-बाप ने नशे की दवा खिलाकर रमीज से कराया डॉक्टर का दुष्कर्म

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इस्लामी धर्मांतरण रैकेट — मां-बाप ने नशे की दवा खिलाकर रमीज से कराया डॉक्टर का दुष्कर्म
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📌 खबर के मुख्य बिंदु (Key Highlights):
  • ताजा अपडेट: इस्लामी धर्मांतरण रैकेट — मां-बाप ने नशे की दवा खिलाकर रमीज से कराया डॉक्टर का...
  • स्थानीय प्रभाव: घटनाक्रम पर प्रशासन और पुलिस बल की पैनी नजर, स्थिति सामान्य।
  • विस्तृत रिपोर्ट: संपूर्ण विवरण, घटनाक्रम और संबंधित बयानों को नीचे पढ़ें।

लखनऊ। केजीएमयू की सफेद कोट वाली दुनिया के पीछे एक ऐसा इस्लामी धर्मांतरण रैकेट चल रहा था, जिसमें डॉक्टर रमीजुद्दीन उर्फ रमीज अकेला नहीं था। उसके मां-बाप भी उसी मशीन के पुर्जे थे। आरोप सीधा और साफ है — युवती डॉक्टर को नशे की दवा खिलाई गई, फिर बेटे रमीज से उसका दुष्कर्म करवाया गया। उसके बाद अश्लील वीडियो और फोटो बनाकर ब्लैकमेल का फंदा कसा गया। मकसद एक ही था: जबरन मतांतरण और पूरा नियंत्रण।

मुख्य आरोपी रमीज के साथ उसके पिता सलीमुद्दीन और मां खातिजा नामजद हैं। तीनों ने पहले खुद को सेकुलर बताकर गैर-मुस्लिम महिला डॉक्टरों का भरोसा जीता। हंसी-मजाक, हमदर्दी, “हम तो जाति-धर्म से ऊपर हैं” — यही चेहरा था। भरोसा जमते ही चेहरा बदला। शुरू हुआ ब्रेनवाश। न मानने पर शराब की बोतल से मारपीट। प्रतिरोध पर गर्म प्रेस से शरीर जलाना। यातनाएं इतनी कि पीड़िताएं डिप्रेशन की दलदल में धंस गईं। कुछ इतनी टूट गईं कि आत्महत्या की कोशिश तक कर बैठीं।

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दो पीड़िता डॉक्टर गर्भवती हुईं। दोनों को गर्भपात करवाया गया। एक डॉक्टर ने 13 दिसंबर 2025 को शिकायत दर्ज कराई — शादी के बहाने यौन शोषण, जबरन गर्भपात और जबरन मतांतरण। पुलिस ने रमीज, उसके माता-पिता और गवाह शारिक खान समेत चार आरोपियों पर चार्जशीट दाखिल कर दी। STF को आरोपियों के लैपटॉप और मोबाइल से सबूत भी मिले। अश्लील सामग्री, संदेशों की लड़ी, दबाव की कड़ियां — सब कागजों पर दर्ज हो चुकी हैं।


यह कांड सिर्फ एक परिवार की साजिश नहीं था। केजीएमयू के अंदर माहौल ऐसा था कि पीड़िता को बचाने वाले कम और दबाने वाले ज्यादा दिखे। STF रिपोर्ट में विभाग प्रमुख प्रो. सुरेश बाबू पर भी उंगली उठी है। आरोप है कि गैर-मुस्लिम रेजिडेंट्स को छठ पूजा या दादा-दादी की अंत्येष्टि के लिए छुट्टी तक नहीं मिलती थी, जबकि मुस्लिम रेजिडेंट्स को नमाज और शादी के नाम पर आसानी से छुट्टी मिल जाती थी। एक रेजिडेंट डॉ. हर्षित जैन जब दादा-दादी की अंत्येष्टि के लिए छुट्टी मांगी, तो जवाब मिला — “चिता की आग तुम खुद लगाओगे क्या?” रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि प्रो. बाबू ने पीड़िता को “साइकोपैथ” कहा, परिवार पर समझौते का दबाव बनाया और विभागीय बैठकों में रमीज को क्लीन चिट दी।

यही तरीका है। पहले सेकुलर मुखौटा। फिर नशा। फिर दुष्कर्म। फिर प्रेस और बोतल से यातना। फिर वीडियो से ब्लैकमेल। फिर गर्भपात। फिर मतांतरण। डिग्री एमडी हो या सड़क किनारे का जाल — नेटवर्क एक ही चाल चलता है। केजीएमयू की दीवारों के अंदर चल रही यह मशीनरी अब STF के कागजों पर है। पीड़िता डॉक्टरों ने आवाज दी। सिस्टम ने पहले झुठलाने और दबाने की कोशिश की। अब सवाल सिस्टम पर है — संरक्षण किसका था, और क्यों?

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रैकेट का पैटर्न साफ पढ़ा जा सकता है। पहले विश्वास। फिर अलग-थलग करना। फिर नशा और यौन हिंसा। फिर सबूत बनाकर ब्लैकमेल। फिर धर्म बदलने का दबाव। बीच में गर्भपात जैसी क्रूरता, ताकि पीड़िता और ज्यादा कमजोर हो जाए। यह “लव” नहीं था। यह शिकार था।

केजीएमयू जैसे संस्थान में अगर ऐसी मशीनरी सालों तक सांस लेती रही, तो सवाल सिर्फ तीन आरोपियों तक नहीं रुकता। सवाल उन कमरों पर भी है जहां शिकायत को पागलपन बता दिया गया। सवाल उन बैठकों पर भी है जहां आरोपी को बचाव मिला और पीड़िता पर समझौते का बोझ डाला गया। सवाल छुट्टियों के दोहरे मापदंड पर भी है — एक तरफ नमाज और शादी, दूसरी तरफ छठ और अंत्येष्टि पर ठुकराया जाना।


STF के सामने आए सबूत बताते हैं कि फोन और लैपटॉप पर सिर्फ निजी गलतियां नहीं थीं। वहां दबाव, अश्लील सामग्री और नियंत्रण की कहानी थी। चार्जशीट में चार नाम आना दिखाता है कि यह अकेला अपराध नहीं, संगठित खेल था। गवाह का नाम भी उसी श्रृंखला में जुड़ता है।

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देश भर में धर्मांतरण के कई चेहरे दिखते हैं। कोई गरीब बस्ती में जाल बिछाता है, कोई मेडिकल कॉलेज की डिग्री के पीछे छिपता है। तरीका एक है — कमजोर क्षण पकड़ना, डर पैदा करना, सबूत से बांधना, फिर आस्था तोड़ना। केजीएमयू प्रकरण उसी श्रृंखला की कड़ी है, बस मंच सफेद कोट वाला है।

पीड़िताओं की कहानी सिर्फ अखबार की सुर्खी नहीं है। यह उन डॉक्टरों की कहानी है जिन्होंने रात की ड्यूटी दी, मरीजों की सेवा की, और खुद संस्थान के अंदर शिकार बना दी गईं। जब उन्होंने आवाज उठाई, तो पहले उन्हें झुठलाया गया। अब STF की फाइलें उस झुठलाने को चुनौती दे रही हैं।

अब जरूरत है सख्त कार्रवाई की — आरोपियों पर, और उस संरक्षण तंत्र पर भी जिसने सालों तक आंखें मूंद रखीं। केजीएमयू की साख मरीजों के भरोसे पर टिकी है। अगर दीवारों के अंदर धर्मांतरण रैकेट और यौन हिंसा फलती रही, तो सिर्फ नाम नहीं, पूरा विश्वास जल जाएगा।

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