
नई दिल्ली/सिंगापुर: अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी की करारी हार का असर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल बाजार पर साफ दिख रहा है। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, बुधवार को ब्रेंट और अमेरिकी WTI क्रूड दोनों में 8% से ज्यादा की भारी गिरावट आई और ये 31 अगस्त के बाद के सबसे निचले स्तर पर बंद हुए। बाजार को उम्मीद है कि चुनावी हार के बाद अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध के और भड़कने का खतरा कम हो सकता है।
हालांकि गुरुवार (5 नवंबर) को कीमतों में कुछ रिकवरी दिखी। CNBC पर प्रकाशित Reuters रिपोर्ट के अनुसार ब्रेंट फ्यूचर्स 1.53 डॉलर (1.6%) चढ़कर 96.15 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जबकि WTI 52 सेंट (0.6%) बढ़कर 88.64 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था।
| बेंचमार्क | गुरुवार का भाव (प्रति बैरल) | बदलाव |
| ब्रेंट क्रूड | $96.15 | +$1.53 (+1.6%) |
| WTI क्रूड | $88.64 | +$0.52 (+0.6%) |
UBS के कमोडिटी विश्लेषक जियोवानी स्टाउनोवो ने कहा, “मध्य पूर्व की स्थिति अभी भी अनसुलझी है और इसीलिए इस समय कीमतों में कुछ मामूली रिकवरी है।” उन्होंने बताया कि ब्रेंट भू-राजनीतिक कारकों से ज्यादा प्रभावित होता है, जबकि WTI एक घरेलू अमेरिकी बेंचमार्क है।
ट्रंप ने इस साल फरवरी में इजरायल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू किया था। इसके चलते अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए ईंधन महंगा हुआ, जो मंगलवार के चुनाव में रिपब्लिकन की हार का बड़ा कारण बना। Sparta Commodities की वरिष्ठ तेल विश्लेषक जून गोह ने कहा, “बाजार मिडटर्म चुनाव के ट्रंप के अगले कदमों पर असर का आकलन कर रहा है और युद्ध खत्म होने की ज्यादा संभावना को कीमतों में शामिल कर रहा है।” लेकिन उन्होंने आगाह किया कि आगे और उतार-चढ़ाव होगा क्योंकि युद्ध खत्म करने की कूटनीति की राह में कई अनिश्चितताएं हैं और वैश्विक रणनीतिक भंडार बहुत कम हो चुके हैं।
विश्लेषकों के मुताबिक खाड़ी देशों की ज्यादातर तेल सप्लाई वाले होर्मुज जलडमरूमध्य से कच्चे तेल की शिपमेंट युद्ध से पहले के स्तर के करीब लौट आई है, हालांकि लागत ज्यादा है। JPMorgan के अनुसार खाड़ी की सप्लाई बहाल होने से वैश्विक बाजार सितंबर में 1.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन और अक्टूबर में 1.4 मिलियन बैरल प्रतिदिन के सरप्लस में लौट आया। इस बीच ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने गुरुवार को दावा किया कि होर्मुज में अनधिकृत रास्ते इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे दो तेल टैंकरों और एक टगबोट में आग लग गई। इस खबर को विस्तार से यहां पढ़ें।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट से देश के आयात बिल, रुपये और महंगाई पर राहत की उम्मीद बनती है। हालांकि देश में पेट्रोल-डीजल के खुदरा दाम तुरंत अंतरराष्ट्रीय बाजार के हिसाब से नहीं बदलते; तेल कंपनियां कीमतों पर कई कारकों- जैसे विनिमय दर, रिफाइनिंग मार्जिन और टैक्स- को देखते हुए फैसला करती हैं। फिलहाल पेट्रोल-डीजल के दाम घटाने को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। जानकारों का कहना है कि अगर कीमतें लंबे समय तक नीचे बनी रहीं तभी आम उपभोक्ता को राहत की गुंजाइश बनेगी।
अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के मुताबिक पिछले हफ्ते अमेरिका में कच्चे तेल, गैसोलीन और डिस्टिलेट के भंडार घटे, क्योंकि मांग एक साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। कारोबार और दुनिया की हर बड़ी खबर के लिए पढ़ते रहें ऑनलाइन समाचार अयोध्या।
स्रोत: Reuters/CNBC (5 नवंबर 2026), UBS, Sparta Commodities, Eurasia Group, JPMorgan, Citi एवं US EIA के हवाले से। फीचर्ड इमेज: ऑयल पंप जैक की प्रतीकात्मक फाइल फोटो (Wikimedia Commons, CC BY-SA 2.0)। यह लेख निवेश सलाह नहीं है।
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